पुरानी इमारतें हमेशा कुछ छुपाकर रखती हैं—आवाज़ें, यादें… और कभी-कभी वो चीज़ें, जो कभी गई ही नहीं।
मैं उस बिल्डिंग में नया किराएदार था। सस्ता था, शहर के बीचों-बीच था… और सबसे बड़ी बात—मालिक ने ज्यादा सवाल नहीं पूछे।
बस एक बात अजीब थी।
उसने चाबी देते हुए कहा:
“तीसरी मंज़िल पर मत जाना… वहाँ कुछ नहीं है।”
“कुछ नहीं है”—ये शब्द अक्सर सबसे ज़्यादा कुछ छुपाते हैं।
पहली रात
कमरा ठीक था। थोड़ा पुराना, दीवारों पर हल्के दाग, और छत का पंखा जो हर घुमाव पर हल्की टक-टक की आवाज़ करता था।
रात के करीब 2 बजे…
मुझे ऊपर से आवाज़ आई।
धीरे-धीरे चलने की।
ठक… ठक… ठक…
मैंने घड़ी देखी।
तीसरी मंज़िल… बंद थी।
तो फिर… कोई चल कैसे रहा था?
मैंने खुद को समझाया—“पुरानी बिल्डिंग है, आवाज़ें गूंजती हैं।”
लेकिन दिल मान नहीं रहा था।
दूसरी रात
इस बार मैं तैयार था।
आवाज़ फिर आई।
लेकिन इस बार… वो सिर्फ चलने की नहीं थी।
जैसे कोई चीज़ घसीट रहा हो।
ठक… घssss… ठक… घssss…
मैंने दरवाज़ा खोला।
सीढ़ियों की तरफ देखा।
अंधेरा।
लेकिन ऊपर… कुछ हिल रहा था।
जैसे कोई छाया… सीढ़ियों के किनारे से पीछे हट गई हो।
मेरे कदम अपने आप ऊपर बढ़ने लगे।
तीसरी मंज़िल
दरवाज़ा आधा खुला था।
जबकि मालिक ने कहा था—वहाँ कोई नहीं जाता।
मैंने हल्का सा धक्का दिया।
चीईईक…
दरवाज़ा खुल गया।
अंदर पूरी तरह अंधेरा था।
लेकिन… ठंडी हवा का झोंका आया।
और साथ में…
एक गंध।
पुरानी… सड़ी हुई… जैसे कुछ बहुत समय से बंद हो।
वो कमरा
मैंने मोबाइल की फ्लैशलाइट ऑन की।
दीवारें खुरची हुई थीं।
जैसे किसी ने नाखूनों से कुछ लिखने की कोशिश की हो।
फर्श पर निशान थे—घसीटने के।
और कमरे के बीचों-बीच…
एक कुर्सी।
जिस पर रस्सियाँ बंधी थीं।
खाली।
लेकिन… हिल रही थी।
धीरे-धीरे।
जैसे कोई अभी-अभी उठा हो।
फिर आवाज़ आई
मेरे पीछे से।
बहुत करीब से।
“तुम नीचे क्यों नहीं रहे…?”
मेरी सांस रुक गई।
मैंने धीरे-धीरे पीछे देखा।
कोई नहीं।
लेकिन… दीवार पर मेरी परछाईं के साथ एक और परछाईं थी।
जो मेरी नहीं थी।
सच
अचानक मेरे फोन की लाइट बंद हो गई।
पूरा कमरा अंधेरे में डूब गया।
और उसी अंधेरे में…
मुझे महसूस हुआ—
कोई मेरे बहुत पास खड़ा है।
इतना पास… कि उसकी सांस मेरी गर्दन को छू रही थी।
“अब तुम आ गए हो…”
“तो कोई नीचे जाएगा…”
अगली सुबह
पुलिस आई थी।
नीचे के लोगों ने शिकायत की थी—रात भर ऊपर से आवाज़ें आ रही थीं।
उन्होंने तीसरी मंज़िल का दरवाज़ा तोड़ा।
अंदर एक कुर्सी थी।
रस्सियों से बंधा हुआ एक शरीर।
सड़ा हुआ।
चेहरा पहचान से बाहर।
लेकिन जेब में जो आईडी थी…
उस पर मेरा नाम था।
और अब…
बिल्डिंग में नया किराएदार आ चुका है।
मालिक फिर वही बात कह रहा है—
“तीसरी मंज़िल पर मत जाना… वहाँ कुछ नहीं है।”
लेकिन हर रात…
ठीक 2 बजे…
ऊपर से आवाज़ आती है—
ठक… घssss… ठक… घssss…
और कभी-कभी…
कोई दरवाज़े के बाहर खड़ा होकर धीरे से कहता है—
“ऊपर आओ…”
Read this also:

Hardik is a professional writer and researcher with over 5 years of experience and a Master’s in Writing. He specializes in simplifying complex topics and government schemes into easy-to-understand guides. Passionate about accuracy and empowerment, Hardik helps the Namaste Vishwa community stay informed and navigate opportunities with confidence.



